सोमवार, 26 अगस्त 2024

श्री कृष्ण

कृष्ण केवल आस्था ही नही, बल्कि एक जीवन दर्शन है जो अनगिनत दिलों को जीवंत खुशियाँ देने वाली महान चरित्र सृष्टि है। ऐसा व्यक्तित्व इस धरती पर  खोज पाना दुर्लभ है। हर व्यक्ति कृष्ण को प्रेम कर सकता है। चोर भी, नाचने वाला भी, साधु भी,असाधु भी, युद्ध के क्षेत्र में लड़ने वाला लड़ाका भी, सामान्य ग्वाला भी, गरीब सुदामा भी, मानस माता यशोदा भी, प्यारी राधा भी, अर्द्धांगिनी रुकमा भी, गोकुल के गोप-गोपियां भी, मथुरा की कुब्जा भी, बाबा नंद भी, गोकुल की सामान्य जनता भी तो मथुरा की प्रजा भी यानी प्रत्येक व्यक्ति उससे प्रेम कर सकता है।
ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है, जिसे श्री कृष्ण गले लगाने से इनकार करें; या  कहें कि तू हमें स्वीकार नहीं हैं, वो सबके लिए हैं, इनकी यह सबके लिए होने की महान स्वीकार्यता ही उसे कृष्ण से कालजयी श्री कृष्ण बनाती है।
नफरत व स्वार्थ के वर्तमान दौर में अधिक प्रासंगिक बन जाता है, इनका यह सर्व स्वीकार्य स्नेहमयी जीवन दर्शन...🥀
कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं, इस शुभ अवसर पर आपके जीवन में शांति,स्नेह और प्रेम के आशीर्वाद की प्रचुरता हो.......।
लेखक- भींवराज गुर्जर.......✍️

सोमवार, 11 सितंबर 2023

घर वाले तुम्हें डॉन नही थानेदार एस.पी., कलेक्टर, व्यापारी कर्मचारी व अधिकारी देखना चाहते है।

युवा पीढ़ी जिस  उन्माद और उद्दंडी मानसिकता की शिकार हो रही है, अतीव  विचारणीय स्थिति है- आभासी दुनिया (सोशल मिडिया ) से बाहर निकल कर दादा, डॉन, हीरो, की फ़ितरत से हटकर हम लोग गुणवता पूर्ण शिक्षा और नैतिक आचरण की श्रेष्ठता से भी आगे बढ़ सकते है।
✍️✍️🙏🙏
ऐसे लोगों का जीवन भले ही आकर्षक व चमक दमक को लिए यश आराम में गुजरता प्रतीत हो लेकिन वास्तविकता में वो सब आभासी व अल्पकालिक सुख होता है।
देवा गुर्जर कोटा की हत्या दुर्भाग्यपूर्ण है।
बहुत बुरा हुआ, अतीव दुःखद घटना है।😭😭 
इस दर्दनाक अमानवीय घटना को जिसने भी कारित किया है, उसे सख्त से सख्त सजा हो।
वो चाहे किसी भी जाति या धर्म का क्यो न हो, अपराधी कभी किसी जाति के गौरव नही हो सकते वो अपने आप मे  कलंक ही होते हैं। अतः ऐसे लोगों का समाज भी  खुला बहिष्कार करे ताकि इस कलंकित परम्परा पर कुछ हद तक विराम लगे।
इसके साथ यह भी विचारणीय विषय है कि हमारे युवा डॉन  क्यों बनना चाहते है ? बनना है तो ओर भी कई प्रभावशाली स्टेट्स व प्रोफेशन है जिसमे रुतबा भी है और रॉब भी यथा- एस.पी., कलेक्टर, व्यापारी, उच्च अधिकारी व  अन्य कर्मचारी आदि-आदि। 
पर बहुत दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि हमारे युवाओं के आईडल पपला व अन्य अपराध जगत के कुख्यात नाम बनते जा रहे हैं ।
आजकल तो डीजे पर गाने भी यही चलते है- *दूधयो तूने गुर्जरी को पियो गोली चाले बहरोड़ के थाने में* इसका मतलब यह कौम अपराध की दुनियां को अपना फ़ैशन बना रही है, हमारे बच्चों को इस जहरीली विचारधारा के शिकंजे में फंसने से बचाने के लिए समाज के बुद्धिजीवी लोग आगे आए, अपने युवाओं को पाखंड मुक्त समाज और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की तरफ ले जाने का प्रयास करें। 
युवाओं द्वारा आत्मघाती  ट्रेंड को अपनाया जा रहा है  और इससे भी ज्यादा दुःखद व  दुर्भाग्यपूर्ण बात  यह कि समाज भी इसे अपनी मौन स्वीकृति दे बैठा है, जिसका अंतिम परिणाम पतन और बर्बादी के सिवा कुछ नही होगा।
अतः युवा विचार करे कि आज के दौर में लाठी और बंदूक से ज्यादा ताकत कलम और सकूँन की कमाई हैं साथियों ! हमारे आदर्श बैंसला साहब जैसे लोग हो ताकि सही मायनों में हम लोग एक सम्मानजनक जीवनशैली के साथ  स्थायी व टिकाऊ उन्नति को प्राप्त हो सके।
वैसे यह शख्स शायद कोई डॉन नही था बल्कि डॉन का *अभिनय करता था यूट्यूब वीडियो* के लिये।
छोटी मोटी रंजिसे रही होगी किसी से फिर भी लोग मारने तक उतारू हो गए तो स्थियी बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण है।
यहाँ पुलिस प्रशासन पर भी एक प्रश्न चिह्न है कि देवा गुर्जर ने जान से मारने की धमकी और 10 लाख की फिरौती मांगने के फोन आने पर पुलिस में रिपोर्ट भी लिखवाई थी, काल रेकॉर्ड भी दीए थे, फिर भी पुलिस प्रशासन ने कोई संज्ञान नही लिया और देखते ही देखते उक्त व्यक्ति की हत्या हो गयी! 😭😭
👉🏻.... भींवराज गुर्जर.........✍️

गुरुवार, 31 अगस्त 2023

वहीद साहब की विदाई पर ...✍️

जीवंत, जिज्ञासु , जिंदादिल, इंसाफ पसन्द, सामाजिक सरोकारों के लिए प्रतिबद्ध, हँसमुख, चुटीले हास्य-व्यंग्य से सराबोर।।
 रीत-प्रीत, नेह-निष्ठा, स्नेह-समर्पण को समेटे अद्भुत व्यवहार।।
 मधुर वाणी, मानव मन के मंजे हुए पारखी, पुरुषार्थ प्रिय, पुस्तक प्रेमी, कला, ज्ञान कौशल के कुशल कलाकार।
उमंग, ऊर्जा, उत्साह व ईमानदारी से सुसज्जित अनुशासन प्रिय किरदार।
 जैसे समन्वित गुणों की सांझी विरासत श्री अब्दुल वहीद खिलजी साहब ( प्रधानाचार्य महोदय-राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय-मकराना) को दीर्घ कालीन गौरवमयी राजकीय सेवा पूर्ण कर अधिवार्षिकी आयु प्राप्त करने के उपलक्ष्य पर सेवानिवृत्त होने की बधाई व अनंत अशेष  मंगलकामनाएँ।
 ऐसे शिक्षाप्रद जीवनमूल्यों से ओत-प्रोत, सरल, स्नेही, समर्पित व्यक्तित्व का समन्वय लिए कोई विरले ही व्यक्ति होते है।
आपने सदा अपने ज्ञान अपेक्षित वर्ग  को गले लगाकर उनके सपनों की मंजिल को अपना कर्तव्यपथ बनाकर, पुर्ण ऊर्जा व मनोयोग के साथ शिक्षण रूपी स्नेह आशीष देते हुए उनके सपनों व इच्छाओं को पंख देकर नित नई ऊँचाईयां दी है।
जिसके लिए हम सब आपका हृदय से आभार व्यक्त करते है और परम् पिता परमात्मा से दुआ करते है कि आपके जीवन मे आने वाला प्रत्येक नया दिन वैभव, ऐश्वर्य, उन्नति, स्वास्थ्य, समृद्धि, प्रगति, प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि व श्रीवृद्धि लेकर आये...✍️
आपके व्यक्तित्व के बारे में लिखने और बोलने को तो बहुत कुछ है पर मेरी कमजोर कलम व शिथिल वाणी इस विराट व्यक्तित्व के समक्ष बहुत बौनी नजर आती है।
आपका स्नेही- भींवराज गुर्जर[व्याख्याता] रा. उ. मा. वि. बेसरोली....✍️

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2022

कर्नल किरोड़ीसिंह बैसला : 'मेरी पगड़ी ही मेरा राजमुकुट, रेल की पटरियां ही मेरा सिंहासन'

ये गुर्जर आंदोलन के दिनों से कुछ पहले की बात है। मैं भारतीय जनता पार्टी की बीट देखता था और वह पगड़ीधारी कई बार इस पार्टी के ऑफ़िस में दिख जाता था। लेकिन एक दिन मैं उस अलग से लगने वाले इन्सान की तरफ़ खिंचा चला गया। वजह थी उनके सामने रखी एक किताब। यह पुस्तक नेपोलियन की बायोग्राफ़ी थी। फ़िलिप ड्वायर की लिखी "नेपोलियन : दॅ पाथ टु पावर'। एक पगड़ीधारी और लाठी वाला कद्दावर किसान सा दिखता आदमी और वह भी अंगरेज़ी की किताब पढ़े और धोती भी खांटी अंदाज़ में बांधे तो सहसा आकर्षण का विषय हो ही जाता है। यह जिज्ञासा आधुनिक परिवेश की मेरी या मेरे जैसे लोगों की उस कुंठा से उपजती है कि आख़िर कोई धोती-पगड़ी वाला ठेठ ग्रामीण किसान कैसे अंगरेज़ी की बेहतरीन पुस्तक पढ़ सकता है। उन्होंने बताया था कि युवा नेपोलियन उनका नायक है और वे उन्हें सेना के शुरुआती समय से ही पढ़ते रहे हैं। 

कर्नल किरोड़ीसिंह बैसला से यह पहली मुलाकात थी। उस संक्षिप्त सी मुलाकात में उन्होंने जो बताया, वह उनके मानीखेज़ व्यक्तित्व के बारे में बहुत कुछ कहता था। प्रजा की, देश की, राजसत्ता और खूब सारी ऐसी ही बातें। खेत का खलिहान ही हमारा सिंहासन है, वाले दर्शन को मानने वाले किरोड़ीसिंह बैसला इस प्रदेश की ऐसी शख़्सियतों में एक हैं, जिन्होंने आंदोलन काे भिक्षा और दयनीयता से निकालकर आत्मसम्मान से इतना लबरेज़ बनाया कि राजसिंहासन उनके सामने बार-बार झुका। राजस्थान की राजनीति की क्षितिज-रेखा को बींधते आंदोलन की एक भयानक सुहावनी इमारत गढ़ने वाले लोगों में उनका शुमार सदैव ही रहेगा। एक पीड़ित और उपेक्षित समाज ने वर्षों अँधेरे में रहकर अपना दर्द बयां किया तो उसे कर्नल बैसला ने आसमान की बुलंदी में पहुंचा दिया और समाज की दुखती देह का दर्द दूर करने की कोशिश की। 

वे फ़िराक़ गोरखपुरी की पंक्तियों "सूरज-चांद अंगड़ाई लेंगे और तारे अपनी गति बदलेंगे' वाले दर्शन को अपने भीतर बसाए हुए आंदोलनकारी थे। उन्होंने अपने तपेतपाए सैनिक जीवन के अनुभवों को जनआंदोलनों से जोड़ा और आरक्त आंदोलन से एक नई इबारत लिखी। जो अफ़सर और राजनेता अपने घर आए लाेगों को निरीह बनाकर रखते हैं और उनसे मिलने का समय तक नहीं देते, उन्हें बैसला ने लोकतंत्र का नया पाठ पढ़ाया। जो आम आदमी को मिलने का समय नहीं देते हैं, घर और दफ़्तर के बाहर दिनों चक्कर लगवाते हैं और मिलें तो दुत्कार कर भगा देते हैं, उन्हें उन्होंने याचक की मुद्रा में लाकर आम लोगों के बीच रेल की पटरियों पर बुला लिया। 

इस सदी के महान कवि विनोद कुमार शुक्ल का कहना है कि एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी मेरे घर। नदी जैसे लोगों से मिलने नदी किनारे जाऊंगा। कुछ तैरूंगा और डूब जाऊंगा। बैसला ने अपनी तरह के एक नए आंदोलन को जीवंत किया और बताया कि लोक की ताकत क्या होती है। उन्होंने सत्ता की उफनती और मदोन्मत्त नदी को रेल की पटरियों पर बुलवाया और कहा कि इसमें पहले डूबकर देखो तो फिर तैरने की बात सोचना। एक बार तो उन्हें मनाने ऐसे श्री-श्री साधु को आना पड़ा, जिनके लिए सितारे पलक-पाँव पावड़े बिछाते हैं, लेकिन उनकी 'आर्ट ऑव लिविंग' रेल पटरियों पर बैठे फौजी की 'आर्ट ऑव वॉर' के सामने सुदर्शन क्रिया करने लगी! 

बैसला के भीतर गोल्ड्सवर्थी के सीज़र की परंपरा के किस्सों की अनुगूंज थी। उन्होंने युवा नेपोलियन की जीवनी पढ़ी और चर्चा करके छोड़ दी हो, ऐसा नहीं था। उन्होंने उसे अपने भीतर उतारा। आत्मसात किया। उसी तरह जैसे सरदार भगतसिंह ने ऑगस्ट वयाँ को किया था। नेपोलियन ने महज तीस साल में सत्ता को अपने हाथ में करके असंभव को संभव कर दिखाया था। बैसला के लिए भी आंदोलन न तो सुगम था और न अपरिहार्य; लेकिन उन्होंने राजस्थान के शासन तंत्र और प्रशासन तंत्र के भीतर के मिथकों को एक-एक कर कुचल दिया। वे एक जोशो-जुनून से लबालब भरे नेता थे और उनका जुनून जिस उम्र में उभरा, वह इस प्रदेश के युवा नेताओं के लिए बहुत ही रश्क करने वाला है। 

बैसला एक गहरे आंदोलनकारी थे। अपने समय के राजनेताओं के बारे में उनका दृष्टिकोण हैरानीजनक तटस्थ और विवेकशील ढंग से परिपक्व था। उन्होंने तड़ीबाज़ राजनेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों के छक्के छुड़ाए और अपनी शर्तों पर नए नियम और नए कायदे-कानून बनवाए। शासन को झुकाकर नए रंग और नए ढंग बनवाए। उनकी ताकत का आलम यह था कि अपने आंदोलन वाले इलाकों के कई जिलों में वे कलेक्टरों और जिला स्तरीय अधिकारियों की बैठकें लिया करते थे और राज्य सरकार ने इसके लिए बाकायदा एक आदेश निकाला था। भले उनका यह समय कम रहा; लेकिन जितना भी रहा, वह ऐसा था कि समाज के लोगों को लगता था अब पाप कटेगा, संताप हटेगा और जीवन बदलेगा। 

बैसला ने अपने तरीके के अपने आंदोलनों से अपनी एक अलग छवि गढ़ी। युवा नेपोलियन की कामयाबियों को अपने भीतर बसाते हुए बैसला ने राजस्थान के आधुनिक आंदोलनों के इतिहास में अपने आपको एक आकर्षक और नए दृष्टिकोण वाले नेता के रूप में स्थापित किया। हम देखते हैं कि प्राय: सभी आंदोलनकारी हर समय सिस्टम को 'अब्यूज' करते हैं; लेकिन बैसला ने बहुत नफ़ासत से इस जंग खाए सिस्टम के नट-बोल्ट कसे और उसे 'अब्यूज' के बजाय 'यूज' किया। 

राजस्थान में जन आंदोलनों के अकूत कुएं, झरने, नदियां और बावड़यां हैं; लेकिन एक गहरी सूखी नदी से अथाह जल हासिल कर लेने वाला अंदाज़ सिर्फ़ उन्हीं के पास था। उन्हें न कोई मुख्यमंत्री झुका पाया और न कोई सुप्रीम पावर। यह उन्होंने जन आंदोलनों से हासिल किया था; लेकिन जैसे ही वे राजनीति में गए, प्रदेश के लोक हृदय के क्षितिज पर दमकते उनके व्यक्तित्व ने अपनी दुर्लभ आभा को एकबारगी कुछ धूमिल कर दिया था। 

बैसला के व्यक्तित्व की एक अनूठी प्रतिमा लोगों के हृदय में बनी हुई है। उनके आंदोलनों को लेकर सहमतियां-असहमतियां बनी रहेंगी; लेकिन उनके आंदोलन ने पिरामिड की सी उम्र पाई है। जन आंदोलनों के सामने बल्लियां लगाती है, शूल बिछाती है और तरह-तरह के मुकदमे दर्ज़ करती है; लेकिन बैसला ने रेल की पटरियों पर बैठकर सत्ता के शक्ति केंद्रों के तौरतरीकों को बुलबुले की हैसियत में ला दिया। सरकारी तंत्र और राजसत्ता में बैठे राजनेता महीनों-वर्षों तक शांतिपूर्वक चलने वाले धरनों प्रदर्शनों पर ध्यान नहीं देते हैं। यह हर दिन हर सरकार और हर विचार में देखने वाला सच है। बैसला ने एक नई इबारत लिखी और बताया कि नवोदित तृणों के स्पर्श से भी सरकारों और प्रशासन तंत्र की रीढ़ को बिना माथा झुकाए अमरबेल जैसा लचीला बनाकर घुटनों पर लाया जा सकता है। और वह भी तब जब लोकतांत्रिक सभ्यता के खंडहरों में जन आंदोलनों की परंपरा धराशायी होकर सिसक रहे समय में लहूलुहान होकर अपने ही ज़ख्म चाटने को विवश हो।

गुरुवार, 31 मार्च 2022

अलविदा कर्नल साहब

अलविदा कर्नल साहब....
जेठ माह की तपती दोपहरी में रेल पटरियों पर हाथ में लकडी का बेंत लिए बैठे उस बुजुर्ग लाल पगडी वाले शख्स से जब पत्रकार पूछते थे कि क्या दूसरे लोगों को तकलीफ देकर अपनी मांग पूरी करवाना उचित है तो वह शख्स अपनी सफेद मूंछों को मरोडते हुए बडे ताव से कहता था कि यह ठीक नहीं है तो यह कैसे सही हो सकता है कि मेरी कौम की बेटी अच्छे स्कूल में पढना चाहती है, लेकिन आरक्षण के अभाव में उसे अच्छे स्कूल में दाखिला नहीं मिल पाता। वह सरकारी पद पर पहुंचने के बजाय अपने गांव अथवा ढाणी में मवेशियां चराने तक ही सीमित रह जाती है। देश में जब योग्य होने पर भी अधिकार नहीं मिलते तो वहां हक छीनना पड़ता है और इसमें कोई बुराई नहीं है।

वह लाल पगडी वाला बुजुर्ग शख्स था कर्नल किरोडी सिंह बैंसला। अपनी कौम को न्याय दिलाने के लिए बैंसला ने अपनी बूढी उम्र को कभी अपने आंदोलनों में बाधक नहीं बनने दिया। अंतिम समय तक बस इसी बात के लिए लडाई लडते रहे कि कौम के वंचितों को आगे की पंक्ति में कैसे लाया जाए। जब भी बात होती थी तो कहते थे कि उन्हें आंदोलन करने का कोई शौक नहीं है। उन्हें गांव और ढाणियों में रह रहे अपनी कौम का पिछडापन नहीं देखा जाता। फुटपाथ पर रहने वाले गाडिया लुहार और बंजारों व पशुपालक जातियाँ रायका/रेबारी  के दर्द को देखकर वे कराहने लगते थे। इस दर्द को उन्होंने कई बार मंत्रियों और अफसरों के सामने बयां भी किया। वे कहते थे कि मेरा आंदोलन उस दिन पूरा होगा, जब मेरी कौम की बेटी करौली की कलेक्टर बनेंगी। उस दिन मेरा सीना फक्र से तन उठेगा। वे समाज में आंदोलन के माध्यम से शिक्षा की अलख जगाना चाहते थे। आरक्षण का हक पाने के साथ सामाजिक कुरूतियों के खिलाफ भी उन्होंने जंग छेड रखी थी। वे कहते थे कि शिक्षा और स्वास्थ्य पर ध्यान दो, फिजूलखर्ची बंद कर दो। आरक्षण की लडाई के साथ सामाजिक चेतना के मिशन में वे शत-प्रतिशत सफल भी हुए। आज डांग इलाके की गुर्जर बेटियों को बडे-शहरों के अंग्रेजी स्कूलों में पढते देखा जा सकता है, यह कर्नल किरोडी सिंह बैंसला के आंदोलन का ही प्रतिफल है। खेत की पगडंडियों से होकर निकले कर्नल बैंसला मुख्यमंत्री हो या फिर चीफ सैकेट्री, कौम को न्याय दिलाने के लिए भिडने में पूरी दिलेरी दिखाते थे। पाटोली आंदोलन में सरकार की राठौडी के आगे बैंसला पीछे नहीं हटे, बल्कि सरकार को ही पीछे हटना पडा। चौपडा कमेटी का उस वक्त भाजपा सरकार को गठन करना पडा। सरकार के तख्ता पलट के बाद आई कांग्रेस की गहलोत सरकार ने चौपडा कमेटी की रिपोर्ट को स्वीकार किया, जिससे एमबीसी को पांच प्रतिशत आरक्षण मिल सका। लोकसभा चुनाव हो या फिर विधानसभा चुनाव, हर पार्टी प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से कर्नल का हाथ अपनी सिर पर चाहती थी। पूर्वी राजस्थान में लोकसभा चुनाव के दौरान नरेन्द्र मोदी प्रचार करने आए तो उन्हें भी हिण्डौन की सभा में कर्नल किरोडी सिंह बैंसला का हाथ अपने हाथ में उठाकर प्रदर्शित करना पडा था। आरक्षण की मांग को लेकर जब प्रदेश में गुर्जरों का जेल भरो आंदोलन चल रहा था, तब इंडिया टूडे ने कर्नल किरोडी सिंह बैंसला को प्रदेश के उन 25 लोगों की सूची में शामिल किया था, जो अपने संघर्षशील व्यक्तित्व से राजस्थान को प्रभावित कर सकते हैं। इंडिया टूडे ने लिखा था कि कर्नल किरोडी सिंह बैंसला की आंदोलन करने की गोरिल्ला नीति है, जिसका हाल-फिलहात कोई तोड़ नजर नहीं आता है।
टोडाभीम के मूडिया गांव में जन्में कर्नल किरोडी सिंह बैंसला के बारे में कम ही लोगों को पता होगा कि सेना में जाने से पहले किरोडी सिंह सरकारी स्कूल में अंग्रेजी के मास्टरजी थे। अंग्रेजी की उन्हें बडी नॉलेज थी। कॉन्फ्रेंस होती थीं, तब कई बडे अफसर उनसे अंग्रेजी की दिक्कतों का दूर किया करते थे। पिता सेना में थे, इस कारण किरोडी सिंह भी शिक्षक की नौकरी छोड सेना में चले गए। राजपूताना राइफल्स में सिपाही के पद पर भर्ती हुए। उन्होंने वर्ष 1962 और 1965 के युद्ध में पकिस्तान के खिलाफ जौहर दिखाया। अपनी दिलेर कार्यशैली के कारण कर्नल के पद पर पहुंचे बैसला ने पूरा जीवन दिलेरी के साथ जीया। आज वे हमारे बीच में नहीं हैं, लेकिन कौम को न्याय दिलाने के लिए संघर्षशील व्यक्तित्व के रूप में कर्नल साहब की पहचान सदैव बनीं रहेगी।

गुर्जर महानायक को शत् शत् नमन

कर्नल साहब को नमन बारम्बार…......✍️

कर्नल साहब को  दुनिया नमन करे बारम्बार…......✍️

युगों युगों तक होती रहेंगी, हे युग पुरुष तेरी जय जय कार।
ऐसे कर्नल साहब को दुनिया नमन करे बारम्बार।।

इतिहास की एक महान व मार्शल कोम, खुद को भूल चुकी थी,,।
भेड़ बकरियो के पीछे पीछे, पिछड़ेपन मे झूल चुकी थी।।
गरीबी और अशिक्षा ही, समाज की पहचान थी।
वीर जाति, अपने गौरवमय अतीत से अनजान थी।।
ग्वाले बन दर दर भटकते,छूट गये थे घर बार।
ऐसे कर्नल साहब को दुनिया नमन करे बारम्बार।।

हर जाती सरकारी नौकर बनके बेठी थी।
गुर्जर जाति भेड़-बकरियों के रेवड मे ही लेटी थी।।
कच्चे मकान,भूखे नंगे बच्चे, दुर्गम गांवो मे बसेरा था।
जानवरो के साथ ही खाना-पीना और इनके संग ही डेरा था।।
गुर्जर बस्तियो से दूर थी, शिक्षा-शासन और सरकार।
ऐसे कर्नल साहब को दुनिया नमन करे बारम्बार।।

समाज की देख दुर्दशा,,देवधणी का मन भर आया,,।
मुंण्डिया गांव मे,,एक अनमोल हीरे ने जब जन्म पाया।।
बच्चू सिंह के घर, किरोडी ने जन्म लिया।
सेना मे कर्नल बनकर, देश के दुश्मनो को परास्त किया।।
सन 1965 की जंग मे,,बॉर्डर जो कर गये थे पार।
अदम्य साहस वो साक्षात इंडियन रेम्बो का अवतार।
जिब्राल्टर की चट्टान थे यह जोशीले सरदार।।
ऐसे कर्नल साहब को दुनिया नमन करे बारम्बार।।

देश सेवा पूरी करके, सेना से कर्नल जब घर आये।
देख समाज की दुर्दशा, कर्नल मन मे पछताये।।
मेरा तो घर परिवार, बेटा- बेटी सब संपन्न है,,।
लेकिन यह समाज, आज भी क्यो विपन्न है,,।।
अगर समाज सुधार न कर सका, तो मुझे है धिक्कार।
ऐसे कर्नल साहब को दुनिया नमन करे बारम्बार।।

समाज सुधार की सोच, कर्नल के मन एक विचार आया।
आरक्षण से वंचित रहकर, समाज आगे न बड़ पाया।।
अब चाहे कुछ भी हो, समाज को आरक्षण दिलाना है।
आरक्षण पाने को, किसी भी हद तक जाना है।।
सन 2006 मे हिंडोन से, कर्नल ने भरी हुँकार,,।
ऐसे कर्नल साहब को दुनिया नमन करे बारम्बार।।

धीरे धीरे आरक्षण आन्दोलन, सारे प्रदेश मे छाया।
बरसो से सोये लोगो को, आरक्षण का लाभ समझाया।।
कर्नल के नेतृत्व मे, समाज ने रणभेरी बजा दी।
हर गांव चौपाल पे, आन्दोलन की बिसात सजा दी।।
बोले आरक्षण लेकर रहेगे, यह है हमारा अधिकार।
ऐसे कर्नल साहब को दुनिया नमन करे बारम्बार।।

पाटोली,पिलुपुरा,,बूंदी, सोहेला, सिकंदरा और ख्ंडार।
प्रदेश मे चारो और, आरक्षण आन्दोलन की चली बयार।।
आरक्षण के वेदी पर, 73 वीरो ने शीशदान किया।
तब जाकर सरकार ने, आरक्षण का वरदान दिया।।
73 वीर शहिदो के लहू का, समाज रहेगा सदा कर्जदार।
ऐसे कर्नल साहब को दुनिया नमन करे बारम्बार।।

आज आरक्षण पाकर, युवा अरमानों को पंख लग गये।
कोई पटवारी,पुलिस तो, कोई मास्टर,RAS बन गये।।रेवड की जगह,अब कर्मचारियो के झुंड निकल रहे।
आरक्षित सीटों से ज्यादा जनरल रैंकों पर  इस कोम के कार्मिक मिल रहे है, सच में कोम के किस्मत बदल रहे हैं।
लड़के लड़किया अनवरत, शिक्षा पथ पे आगे बढ रहे हैं।।
शिक्षा के क्षेत्र मे, आज नई क्रांति का हुआ संचार,।
ऐसे कर्नल साहब को दुनिया नमन करे बारम्बार।।

श्री देवनारायण योजना मे बेटियो को स्कूटी मिल रही,।
हर छात्र के खाते मे, mbc की छात्रवृत्ति डल रही,,।।
जन जन के मन मे, पढ्ने पढ़ाने का उत्साह आया है।
आरक्षण ने सबके मन मे,नौकरी पाने का सपना जो सजाया है।।
समाज की दशा बदल गई, बह रही देखो विकास की धार।
ऐसे कर्नल साहब को दुनिया नमन करे बारम्बार।।

धन्य हो कर्नल साहब, आपने किया सही मायनों समाज सुधार।
युगो युगो तक होती रहेगी, आपके नाम की जयकार।।
जाम्व्ंत की तरह, अपनी शक्ति भूले समाज को जगा दिया।
समाज से पिछड़ेपन व अशिक्षा का दानव जो भगा दिया।।
निश्चित ही कर्नल साहब आप हो, देव अवतार।
ऐसे कर्नल साहब को दुनिया नमन करे बारम्बार।।👏👏
👉 भींवराज गुर्जर.......✍️

शनिवार, 26 फ़रवरी 2022

रूस यूक्रेन युद्ध

रूस-यूक्रेन के बीच युद्ध 
यूक्रेन 1917 तक रूसी साम्राज्य का ही  हिस्सा था, रूस के विघटन के बाद जो देश अलग हुए थे उनमें यूक्रेन भी एक था जिसने 1918 में की थी आजादी की घोषणा।
1921 में लेनिन की सेना से हारने के बाद यूक्रेन 1922 में सोवियत संघ का हिस्सा बन गया जिसका यूक्रेन में विरोध हुआ ।
 1954 में रूसी समर्थक क्रीमिया यूक्रेन को दे दिया गया।
1991 में सोवियत संघ के विघटन के यूक्रेन आजाद राष्ट्र बन गया।
2010 में रूसी समर्थित विक्टर यानुकोविच यूक्रेन के राष्ट्रपति बने थे इनका रूस से करीबी और यूरोप से दूरी की वजह से विरोध हुआ 2014 में पद छोड़ा।
1954 में जो क्रीमिया यूक्रेन को दिया गया वर्ष 2014 में रूस ने पुनः  क्रीमिया को अपने नियंत्रण में ले लिया
इसके साथ यूक्रेन के डोनबास, लुहांस्क और डोनेस्तक में रूसी समर्थक बहुसंख्यक थे इसलिए यहां भी विद्रोह हुए।
इसके बाद से पिछले आठ वर्षों से यूक्रेन सैनिक व रूसी अलगाववादियों के बीच सँघर्ष जारी रहा जिसमे लगभग 14000 व्यक्तियों की मौत हो चुकी है।
बेलारूस, जॉर्जिया पूरी तरह से रूस के साथ है।
नॉटो और यूक्रेन 
दिसम्बर 2021 में यूक्रेन ने की NATO में शामिल होने की घोषणा जिसका रूस ने कड़ा विरोध जताया और यही से वर्तमान विवाद की नींव पड़ी-  क्योकि यूक्रेन NATO का करीब है, कभी NATO ने यूक्रेन के साथ दिया तो यह रूस पर भारी पड़ सकता था।
इस समय यूक्रेन के NATO पड़ोसी देश यूक्रेन से लगी सीमा पर अपने सैनिक, हथियार औऱ सैन्य वाहन पहुँचा रहे है।
रूस का यूक्रेन पर हमले के कारण-
मुख्य रूप से अमेरिका द्वारा यूक्रेन को NATO संगठन में शामिल करने की कवायद, रूस का लगता है कि यदि यूक्रेन नाटो में शामिल हो जाता है तो उसकी सेना व अमेरिका हथियारों के दम पर नुकसान पहुचाने की कोशिश कर सकते है।
दूसरी वजह- अमेरिका और पश्चिमी-यूरोपीय देशों का नार्ड स्ट्रीम-2  पाइपलाइन पर रोक लगाना।
तीसरी वजह- रूस नही चाहता कि यूक्रेन किसी भी तरह से अमेरिका के साथ जाए।
वर्तमान स्थिति-
रूस ने कहाँ-कहाँ किए हमले:- रूस ने अब तक यूक्रेन में कई जगह हमले किये हैं इनमें से दो विद्रोही इलाकों के अलावा राजधानी कीव के कई अहम ठिकाने शामिल हैं।
यूक्रेन के एयरपोर्ट्स को रूसी साइबर हमले खतरे को भांपते हुए बंद कर दिया है।
रूस ने यूक्रेन के ओडेशा पर कब्जा कर रूसी झंडा फहराया।
जर्मनी के चांसलर ओलाफ शोल्ज ने नार्ड स्ट्रीम 2 के प्रमाणन की प्रक्रिया को रोकने की घोषणा की है।