ये गुर्जर आंदोलन के दिनों से कुछ पहले की बात है। मैं भारतीय जनता पार्टी की बीट देखता था और वह पगड़ीधारी कई बार इस पार्टी के ऑफ़िस में दिख जाता था। लेकिन एक दिन मैं उस अलग से लगने वाले इन्सान की तरफ़ खिंचा चला गया। वजह थी उनके सामने रखी एक किताब। यह पुस्तक नेपोलियन की बायोग्राफ़ी थी। फ़िलिप ड्वायर की लिखी "नेपोलियन : दॅ पाथ टु पावर'। एक पगड़ीधारी और लाठी वाला कद्दावर किसान सा दिखता आदमी और वह भी अंगरेज़ी की किताब पढ़े और धोती भी खांटी अंदाज़ में बांधे तो सहसा आकर्षण का विषय हो ही जाता है। यह जिज्ञासा आधुनिक परिवेश की मेरी या मेरे जैसे लोगों की उस कुंठा से उपजती है कि आख़िर कोई धोती-पगड़ी वाला ठेठ ग्रामीण किसान कैसे अंगरेज़ी की बेहतरीन पुस्तक पढ़ सकता है। उन्होंने बताया था कि युवा नेपोलियन उनका नायक है और वे उन्हें सेना के शुरुआती समय से ही पढ़ते रहे हैं।
कर्नल किरोड़ीसिंह बैसला से यह पहली मुलाकात थी। उस संक्षिप्त सी मुलाकात में उन्होंने जो बताया, वह उनके मानीखेज़ व्यक्तित्व के बारे में बहुत कुछ कहता था। प्रजा की, देश की, राजसत्ता और खूब सारी ऐसी ही बातें। खेत का खलिहान ही हमारा सिंहासन है, वाले दर्शन को मानने वाले किरोड़ीसिंह बैसला इस प्रदेश की ऐसी शख़्सियतों में एक हैं, जिन्होंने आंदोलन काे भिक्षा और दयनीयता से निकालकर आत्मसम्मान से इतना लबरेज़ बनाया कि राजसिंहासन उनके सामने बार-बार झुका। राजस्थान की राजनीति की क्षितिज-रेखा को बींधते आंदोलन की एक भयानक सुहावनी इमारत गढ़ने वाले लोगों में उनका शुमार सदैव ही रहेगा। एक पीड़ित और उपेक्षित समाज ने वर्षों अँधेरे में रहकर अपना दर्द बयां किया तो उसे कर्नल बैसला ने आसमान की बुलंदी में पहुंचा दिया और समाज की दुखती देह का दर्द दूर करने की कोशिश की।
वे फ़िराक़ गोरखपुरी की पंक्तियों "सूरज-चांद अंगड़ाई लेंगे और तारे अपनी गति बदलेंगे' वाले दर्शन को अपने भीतर बसाए हुए आंदोलनकारी थे। उन्होंने अपने तपेतपाए सैनिक जीवन के अनुभवों को जनआंदोलनों से जोड़ा और आरक्त आंदोलन से एक नई इबारत लिखी। जो अफ़सर और राजनेता अपने घर आए लाेगों को निरीह बनाकर रखते हैं और उनसे मिलने का समय तक नहीं देते, उन्हें बैसला ने लोकतंत्र का नया पाठ पढ़ाया। जो आम आदमी को मिलने का समय नहीं देते हैं, घर और दफ़्तर के बाहर दिनों चक्कर लगवाते हैं और मिलें तो दुत्कार कर भगा देते हैं, उन्हें उन्होंने याचक की मुद्रा में लाकर आम लोगों के बीच रेल की पटरियों पर बुला लिया।
इस सदी के महान कवि विनोद कुमार शुक्ल का कहना है कि एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी मेरे घर। नदी जैसे लोगों से मिलने नदी किनारे जाऊंगा। कुछ तैरूंगा और डूब जाऊंगा। बैसला ने अपनी तरह के एक नए आंदोलन को जीवंत किया और बताया कि लोक की ताकत क्या होती है। उन्होंने सत्ता की उफनती और मदोन्मत्त नदी को रेल की पटरियों पर बुलवाया और कहा कि इसमें पहले डूबकर देखो तो फिर तैरने की बात सोचना। एक बार तो उन्हें मनाने ऐसे श्री-श्री साधु को आना पड़ा, जिनके लिए सितारे पलक-पाँव पावड़े बिछाते हैं, लेकिन उनकी 'आर्ट ऑव लिविंग' रेल पटरियों पर बैठे फौजी की 'आर्ट ऑव वॉर' के सामने सुदर्शन क्रिया करने लगी!
बैसला के भीतर गोल्ड्सवर्थी के सीज़र की परंपरा के किस्सों की अनुगूंज थी। उन्होंने युवा नेपोलियन की जीवनी पढ़ी और चर्चा करके छोड़ दी हो, ऐसा नहीं था। उन्होंने उसे अपने भीतर उतारा। आत्मसात किया। उसी तरह जैसे सरदार भगतसिंह ने ऑगस्ट वयाँ को किया था। नेपोलियन ने महज तीस साल में सत्ता को अपने हाथ में करके असंभव को संभव कर दिखाया था। बैसला के लिए भी आंदोलन न तो सुगम था और न अपरिहार्य; लेकिन उन्होंने राजस्थान के शासन तंत्र और प्रशासन तंत्र के भीतर के मिथकों को एक-एक कर कुचल दिया। वे एक जोशो-जुनून से लबालब भरे नेता थे और उनका जुनून जिस उम्र में उभरा, वह इस प्रदेश के युवा नेताओं के लिए बहुत ही रश्क करने वाला है।
बैसला एक गहरे आंदोलनकारी थे। अपने समय के राजनेताओं के बारे में उनका दृष्टिकोण हैरानीजनक तटस्थ और विवेकशील ढंग से परिपक्व था। उन्होंने तड़ीबाज़ राजनेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों के छक्के छुड़ाए और अपनी शर्तों पर नए नियम और नए कायदे-कानून बनवाए। शासन को झुकाकर नए रंग और नए ढंग बनवाए। उनकी ताकत का आलम यह था कि अपने आंदोलन वाले इलाकों के कई जिलों में वे कलेक्टरों और जिला स्तरीय अधिकारियों की बैठकें लिया करते थे और राज्य सरकार ने इसके लिए बाकायदा एक आदेश निकाला था। भले उनका यह समय कम रहा; लेकिन जितना भी रहा, वह ऐसा था कि समाज के लोगों को लगता था अब पाप कटेगा, संताप हटेगा और जीवन बदलेगा।
बैसला ने अपने तरीके के अपने आंदोलनों से अपनी एक अलग छवि गढ़ी। युवा नेपोलियन की कामयाबियों को अपने भीतर बसाते हुए बैसला ने राजस्थान के आधुनिक आंदोलनों के इतिहास में अपने आपको एक आकर्षक और नए दृष्टिकोण वाले नेता के रूप में स्थापित किया। हम देखते हैं कि प्राय: सभी आंदोलनकारी हर समय सिस्टम को 'अब्यूज' करते हैं; लेकिन बैसला ने बहुत नफ़ासत से इस जंग खाए सिस्टम के नट-बोल्ट कसे और उसे 'अब्यूज' के बजाय 'यूज' किया।
राजस्थान में जन आंदोलनों के अकूत कुएं, झरने, नदियां और बावड़यां हैं; लेकिन एक गहरी सूखी नदी से अथाह जल हासिल कर लेने वाला अंदाज़ सिर्फ़ उन्हीं के पास था। उन्हें न कोई मुख्यमंत्री झुका पाया और न कोई सुप्रीम पावर। यह उन्होंने जन आंदोलनों से हासिल किया था; लेकिन जैसे ही वे राजनीति में गए, प्रदेश के लोक हृदय के क्षितिज पर दमकते उनके व्यक्तित्व ने अपनी दुर्लभ आभा को एकबारगी कुछ धूमिल कर दिया था।
बैसला के व्यक्तित्व की एक अनूठी प्रतिमा लोगों के हृदय में बनी हुई है। उनके आंदोलनों को लेकर सहमतियां-असहमतियां बनी रहेंगी; लेकिन उनके आंदोलन ने पिरामिड की सी उम्र पाई है। जन आंदोलनों के सामने बल्लियां लगाती है, शूल बिछाती है और तरह-तरह के मुकदमे दर्ज़ करती है; लेकिन बैसला ने रेल की पटरियों पर बैठकर सत्ता के शक्ति केंद्रों के तौरतरीकों को बुलबुले की हैसियत में ला दिया। सरकारी तंत्र और राजसत्ता में बैठे राजनेता महीनों-वर्षों तक शांतिपूर्वक चलने वाले धरनों प्रदर्शनों पर ध्यान नहीं देते हैं। यह हर दिन हर सरकार और हर विचार में देखने वाला सच है। बैसला ने एक नई इबारत लिखी और बताया कि नवोदित तृणों के स्पर्श से भी सरकारों और प्रशासन तंत्र की रीढ़ को बिना माथा झुकाए अमरबेल जैसा लचीला बनाकर घुटनों पर लाया जा सकता है। और वह भी तब जब लोकतांत्रिक सभ्यता के खंडहरों में जन आंदोलनों की परंपरा धराशायी होकर सिसक रहे समय में लहूलुहान होकर अपने ही ज़ख्म चाटने को विवश हो।
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