*''शिक्षक दिवस पर लिखी पंक्तियाॅ जो मैरे आदरणीय गुरुजन को समर्पित* ।।
घर छोड़ कर अपना जो हमारा घर बनाते है,
अपनी मेहनत के पसीने से खुशियो के चिराग जलाते है ।
छोड़कर अपनी दहलीज पर कई आँखे इंतजार की,
जो हमारे साथ सारे दिन और रात बिताते है ।
ऐसे गुरु के चरणो मे हम शीश झुकाते है ।।
आज का सफल पुरूष घर तक दुनियां समेट लेता है,
पर वो आप है जो अपने शिष्यो को भी घर का दायरा समझाते है।
यश नहीं, पैसा नहीं, सम्मान कमाते है,
घर छोड़ अपना जो हमारा कल सजाते है,
ऐसे गुरु के चरणो मे हम शीश झुकाते है ।।
दिनभर की थकान से सिर फट रहा होता है दर्द के मारे तब भी हमे पढ़ाते है,
भूखे है सुबह से फिर भी शिष्यों की शोभा सजाते है,
कभी टीचर कभी तो कभी साथी बन जाते है,
जो जीवन संवारे वो सचे गुरु कहलाते है,
ऐसे गुरु के चरणो मे हम शीश झुकाते है ।
कभी झल्ला कर जो हम पर चिल्लाते है,
मुर्ख है हम जो कुछ समझ नहीं पाते है,
फिर भी अगले दिन मैदान मे आ जाते है,
कुछ नये तरीके ढूंढकर सफलता के मंत्र बताते है ।
वो यश नहीं ,पैसा नहीं ,सम्मान कमाते है,
इस कदर जो जीवन संवारे वो सचे गुरु कहलाते है,
ऐसे गुरु के चरणो मे हम शीश झुकाते है ।
कभी घर वालो से किये वादे भूल जाते है,
कभी जल्दी आने के चक्कर मे सारे दावे भूल जाते है,
वो भूल जाते है ख़ुद के बच्चों को पढ़ाना और दुसरे दीन-हीनो को पढाते है,
कोई स्वार्थ नहीं है ,फिर भी पढ़ाने को आते है,
घर का रास्ता भूल कर हमे सही रास्ता दिखाते है,
अधिकार छोड़ अपने बस कर्त्तव्य निभाते है,
इस कदर जो जिन्दगी संवारे वो कोई ओर नही सचे गुरु कहलाते है,
ऐसे गुरु के चरणो मे हम शीश झुकाते है ।
जो प्रतियोगिता के दोर मे सफलता के प्रगति रथ को चलाते है,
यही रिश्ता जो हमसे निभाने आते है,
दो बाते अकड़ की सुनाकर जो हमारे होश ठिकाने लाते है,
बैरंग अपनी दुनिया के रंग चुराकर,
जो हमारी दहलीज पर रंगोली बनाते है ।
यह कोई तनख्वाह के लिए नहीं, बस यह एक रिश्ता है ,नाता है गुरु शिष्य का उसी पर कदमो को बढाते है,
आप वही राधाकृष्णन् है जो अपने शिष्यो (हमे) को प्रतियोगी धुरंधर बनाते है।
बस ज्ञान की लौ प्रज्वलित हो इसी विचार से काम करवाते है,
हमारी की हर उपलब्धि पर,
जो गर्व से इठलाते है।
वो पैसा नहीं ,यश नहीं ,सम्मान कमाते है,
वो धन नहीं ,दौलत नहीं, बस मुस्कान कमाते है ।
ऐसे गुरु के चरणो मे हम शीश झुकाते है ।।
लेखक :- भींवराज गुर्जर
घर छोड़ कर अपना जो हमारा घर बनाते है,
अपनी मेहनत के पसीने से खुशियो के चिराग जलाते है ।
छोड़कर अपनी दहलीज पर कई आँखे इंतजार की,
जो हमारे साथ सारे दिन और रात बिताते है ।
ऐसे गुरु के चरणो मे हम शीश झुकाते है ।।
आज का सफल पुरूष घर तक दुनियां समेट लेता है,
पर वो आप है जो अपने शिष्यो को भी घर का दायरा समझाते है।
यश नहीं, पैसा नहीं, सम्मान कमाते है,
घर छोड़ अपना जो हमारा कल सजाते है,
ऐसे गुरु के चरणो मे हम शीश झुकाते है ।।
दिनभर की थकान से सिर फट रहा होता है दर्द के मारे तब भी हमे पढ़ाते है,
भूखे है सुबह से फिर भी शिष्यों की शोभा सजाते है,
कभी टीचर कभी तो कभी साथी बन जाते है,
जो जीवन संवारे वो सचे गुरु कहलाते है,
ऐसे गुरु के चरणो मे हम शीश झुकाते है ।
कभी झल्ला कर जो हम पर चिल्लाते है,
मुर्ख है हम जो कुछ समझ नहीं पाते है,
फिर भी अगले दिन मैदान मे आ जाते है,
कुछ नये तरीके ढूंढकर सफलता के मंत्र बताते है ।
वो यश नहीं ,पैसा नहीं ,सम्मान कमाते है,
इस कदर जो जीवन संवारे वो सचे गुरु कहलाते है,
ऐसे गुरु के चरणो मे हम शीश झुकाते है ।
कभी घर वालो से किये वादे भूल जाते है,
कभी जल्दी आने के चक्कर मे सारे दावे भूल जाते है,
वो भूल जाते है ख़ुद के बच्चों को पढ़ाना और दुसरे दीन-हीनो को पढाते है,
कोई स्वार्थ नहीं है ,फिर भी पढ़ाने को आते है,
घर का रास्ता भूल कर हमे सही रास्ता दिखाते है,
अधिकार छोड़ अपने बस कर्त्तव्य निभाते है,
इस कदर जो जिन्दगी संवारे वो कोई ओर नही सचे गुरु कहलाते है,
ऐसे गुरु के चरणो मे हम शीश झुकाते है ।
जो प्रतियोगिता के दोर मे सफलता के प्रगति रथ को चलाते है,
यही रिश्ता जो हमसे निभाने आते है,
दो बाते अकड़ की सुनाकर जो हमारे होश ठिकाने लाते है,
बैरंग अपनी दुनिया के रंग चुराकर,
जो हमारी दहलीज पर रंगोली बनाते है ।
यह कोई तनख्वाह के लिए नहीं, बस यह एक रिश्ता है ,नाता है गुरु शिष्य का उसी पर कदमो को बढाते है,
आप वही राधाकृष्णन् है जो अपने शिष्यो (हमे) को प्रतियोगी धुरंधर बनाते है।
बस ज्ञान की लौ प्रज्वलित हो इसी विचार से काम करवाते है,
हमारी की हर उपलब्धि पर,
जो गर्व से इठलाते है।
वो पैसा नहीं ,यश नहीं ,सम्मान कमाते है,
वो धन नहीं ,दौलत नहीं, बस मुस्कान कमाते है ।
ऐसे गुरु के चरणो मे हम शीश झुकाते है ।।
लेखक :- भींवराज गुर्जर