अलविदा कर्नल साहब....
जेठ माह की तपती दोपहरी में रेल पटरियों पर हाथ में लकडी का बेंत लिए बैठे उस बुजुर्ग लाल पगडी वाले शख्स से जब पत्रकार पूछते थे कि क्या दूसरे लोगों को तकलीफ देकर अपनी मांग पूरी करवाना उचित है तो वह शख्स अपनी सफेद मूंछों को मरोडते हुए बडे ताव से कहता था कि यह ठीक नहीं है तो यह कैसे सही हो सकता है कि मेरी कौम की बेटी अच्छे स्कूल में पढना चाहती है, लेकिन आरक्षण के अभाव में उसे अच्छे स्कूल में दाखिला नहीं मिल पाता। वह सरकारी पद पर पहुंचने के बजाय अपने गांव अथवा ढाणी में मवेशियां चराने तक ही सीमित रह जाती है। देश में जब योग्य होने पर भी अधिकार नहीं मिलते तो वहां हक छीनना पड़ता है और इसमें कोई बुराई नहीं है।
वह लाल पगडी वाला बुजुर्ग शख्स था कर्नल किरोडी सिंह बैंसला। अपनी कौम को न्याय दिलाने के लिए बैंसला ने अपनी बूढी उम्र को कभी अपने आंदोलनों में बाधक नहीं बनने दिया। अंतिम समय तक बस इसी बात के लिए लडाई लडते रहे कि कौम के वंचितों को आगे की पंक्ति में कैसे लाया जाए। जब भी बात होती थी तो कहते थे कि उन्हें आंदोलन करने का कोई शौक नहीं है। उन्हें गांव और ढाणियों में रह रहे अपनी कौम का पिछडापन नहीं देखा जाता। फुटपाथ पर रहने वाले गाडिया लुहार और बंजारों व पशुपालक जातियाँ रायका/रेबारी के दर्द को देखकर वे कराहने लगते थे। इस दर्द को उन्होंने कई बार मंत्रियों और अफसरों के सामने बयां भी किया। वे कहते थे कि मेरा आंदोलन उस दिन पूरा होगा, जब मेरी कौम की बेटी करौली की कलेक्टर बनेंगी। उस दिन मेरा सीना फक्र से तन उठेगा। वे समाज में आंदोलन के माध्यम से शिक्षा की अलख जगाना चाहते थे। आरक्षण का हक पाने के साथ सामाजिक कुरूतियों के खिलाफ भी उन्होंने जंग छेड रखी थी। वे कहते थे कि शिक्षा और स्वास्थ्य पर ध्यान दो, फिजूलखर्ची बंद कर दो। आरक्षण की लडाई के साथ सामाजिक चेतना के मिशन में वे शत-प्रतिशत सफल भी हुए। आज डांग इलाके की गुर्जर बेटियों को बडे-शहरों के अंग्रेजी स्कूलों में पढते देखा जा सकता है, यह कर्नल किरोडी सिंह बैंसला के आंदोलन का ही प्रतिफल है। खेत की पगडंडियों से होकर निकले कर्नल बैंसला मुख्यमंत्री हो या फिर चीफ सैकेट्री, कौम को न्याय दिलाने के लिए भिडने में पूरी दिलेरी दिखाते थे। पाटोली आंदोलन में सरकार की राठौडी के आगे बैंसला पीछे नहीं हटे, बल्कि सरकार को ही पीछे हटना पडा। चौपडा कमेटी का उस वक्त भाजपा सरकार को गठन करना पडा। सरकार के तख्ता पलट के बाद आई कांग्रेस की गहलोत सरकार ने चौपडा कमेटी की रिपोर्ट को स्वीकार किया, जिससे एमबीसी को पांच प्रतिशत आरक्षण मिल सका। लोकसभा चुनाव हो या फिर विधानसभा चुनाव, हर पार्टी प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से कर्नल का हाथ अपनी सिर पर चाहती थी। पूर्वी राजस्थान में लोकसभा चुनाव के दौरान नरेन्द्र मोदी प्रचार करने आए तो उन्हें भी हिण्डौन की सभा में कर्नल किरोडी सिंह बैंसला का हाथ अपने हाथ में उठाकर प्रदर्शित करना पडा था। आरक्षण की मांग को लेकर जब प्रदेश में गुर्जरों का जेल भरो आंदोलन चल रहा था, तब इंडिया टूडे ने कर्नल किरोडी सिंह बैंसला को प्रदेश के उन 25 लोगों की सूची में शामिल किया था, जो अपने संघर्षशील व्यक्तित्व से राजस्थान को प्रभावित कर सकते हैं। इंडिया टूडे ने लिखा था कि कर्नल किरोडी सिंह बैंसला की आंदोलन करने की गोरिल्ला नीति है, जिसका हाल-फिलहात कोई तोड़ नजर नहीं आता है।
टोडाभीम के मूडिया गांव में जन्में कर्नल किरोडी सिंह बैंसला के बारे में कम ही लोगों को पता होगा कि सेना में जाने से पहले किरोडी सिंह सरकारी स्कूल में अंग्रेजी के मास्टरजी थे। अंग्रेजी की उन्हें बडी नॉलेज थी। कॉन्फ्रेंस होती थीं, तब कई बडे अफसर उनसे अंग्रेजी की दिक्कतों का दूर किया करते थे। पिता सेना में थे, इस कारण किरोडी सिंह भी शिक्षक की नौकरी छोड सेना में चले गए। राजपूताना राइफल्स में सिपाही के पद पर भर्ती हुए। उन्होंने वर्ष 1962 और 1965 के युद्ध में पकिस्तान के खिलाफ जौहर दिखाया। अपनी दिलेर कार्यशैली के कारण कर्नल के पद पर पहुंचे बैसला ने पूरा जीवन दिलेरी के साथ जीया। आज वे हमारे बीच में नहीं हैं, लेकिन कौम को न्याय दिलाने के लिए संघर्षशील व्यक्तित्व के रूप में कर्नल साहब की पहचान सदैव बनीं रहेगी।
गुर्जर महानायक को शत् शत् नमन
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