रविवार, 19 अप्रैल 2020

मेरा धर्म- राष्ट्रधर्म

साथियों आज के परिदृश्य में कुछ असामान्य व अनअपेक्षित घटनाओं की गहराई को  देखे, सोचे और विचारे तो लगता है:-  हम राष्ट्र रूपी महा-वृक्ष की मूल यानी जड़ से विमुख व अलग(विकेंद्रित) होकर इसकी कमजोर  शाखाओं (क्षेत्र,जाति,धर्म) में बंटकर राष्ट्रीयता रूपी सूखती टहनियों व  पत्तियों को महज थोथी देशभक्ति का पानी देकर इस महावृक्ष की श्रीवृद्धि, समृद्धि व सम्पन्नता के विफल प्रयासों में लगे हुए हैं, जिसमे समय के साथ पर्यावरणीय दशाओ की अनुकूलतानुसार नए-नए खाद व कीटनाशी इस राष्ट्रीयता से शुरू होकर धर्म, जातियता की यात्रा करते हुए एक बहुत लम्बे कालखण्ड के प्रभाव से धुंधली पड़ी नजर को सस्ती व सुलभ दृष्टि देने के लिए आधुनिकता के चश्में लेकर मिशन मंगल व चाँद के पार जाना चाहते है पर भूल गए कि राष्ट्र व राष्ट्रीयता बहुत पीछे छूट गयी है, इसलिए इस विस्तार को समेटने के लिए आबादी का  बड़ा तबका मंदिर, मस्जिद के यंत्र लेकर निकल पड़ा, शेष अतिबुद्धिमान व समझदार  कहे जाने वाले लोग विज्ञान की धार पैनी करने लगे क्योकि वो राष्ट्रवृक्ष जड़ से अलग जो हुआ तो कैसे अपनी विशालता की समृद्धि को पा सकता था, अब इसके तने में कोटर बना आवास पाता आम जनसमुदाय भी सूखी, टहनियों व पतियों को अवसर के रूप में देखने लगा।
आज तक मूल से अलग हो कोई भी अपने अस्तित्व को नही बचा पाया है अतः विचारे, हम कहा से शुरू हुए क्या सींचा ओर कहा तक आ गए है।।
वर्तमान हालात की विपरीतता व संकट की घड़ी में अथाह गहराई में दबी पड़ी अवचेतन राष्ट्र-भक्ति को जगाइये, क्षेत्र, जाती, धर्म,मजहब  से ऊपर उठकर एक ही धर्म राष्ट्रधर्म अपनाईये।
मानवता व राष्ट्र की रक्षा के लिए  इस समय के सबसे पवित्र व प्रमुख धर्म यानी राष्ट्रधर्म को निभाईये, व्यक्तिनिष्ठ  क्षेत्र, जाति, धर्म व मजहब की अतिशयता को भूल जाईये।।
 अपने घरों में रहकर सच्ची राष्ट्रभक्ति दिखाईये।।
अपने आप को बचाईये, राष्ट्र बचाईये।।
✍🏼 भींवराज गुर्जर  [ एक शिक्षक ]

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